होम Editorial पत्रकारिता की ‘गोली’, दाभोलकर, पानसरे, राजदेव, रामचंद्र और अब गौरी

पत्रकारिता की ‘गोली’, दाभोलकर, पानसरे, राजदेव, रामचंद्र और अब गौरी

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गौरी लंकेश

अगर अभी भी आंखें नहीं खुलीं तो अंधे बनने का नाटक बंद करो…!!! अगर कुछ लिखने में डर लगता है तो पत्रकार होने का दंभ ना भरो…!!! गौरी जो कह कर गई है अगर उसे अनसुना कर रहे हो, तो बहरे होने का नाटक बंद करो…!!!
अफसोस, निंदा, आंसू, आरोप, और एक नई जांच का दिखावा…! दूसरे अन्य दिवंगत पत्रकारों की तरह ही गौरी के जाने के बाद भी वहीं सबकुछ हुआ जिसका अंदेशा शायद हर पत्रकार को इस हत्या के बाद करीब-करीब हो चला था। कलम के कातिलों को सजा क्या मिलेगी…? यह भविष्य के गर्भ में है। लेकिन तेजी से घटते निर्भिक और बेबाक पत्रकारों की संख्या नई पीढ़ी को कैसी पत्रकारिता सिखा रही है…? शायद यह सोचने का वक्त अब आ चुका है। इस हत्याकांड से सहमे हर पत्रकार के दिल में यह सवाल जरुर उठ रहा होगा कि भविष्य में कलम कितना स्वतंत्र हो और कलम कितना सच लिखे ये कौन तय करेगा…? क्या इसे अपराधियों की धमकी या गोलियों से तय किया जाएगा या फिर भविष्य में कलम सिर्फ राजनीतिज्ञों के जेब की शोभा बन कर रह जाएगा।

हर साल देश में सैकड़ों युवा पत्रकार अलग-अलग संस्थानों से पढ़कर निकलते हैं और फिर अलग-अलग मीडिया घरानों में अपनी पत्रकारिता को बेहतर मुकाम देने के लिए जी-तोड़ मेहनत में जुट जाते हैं। इस उम्मीद में कि अपनी कलम की ताकत से वो समाज को सच का आईना दिखाएंगे और अपनी निर्भिकता से पत्रकारिता के उसूलों की नज़ीर बनेंगे। भविष्य के पत्रकारों की यहां चर्चा इसलिए भी जरूरी है क्योंकि गौरी भी ऐसी ही थी। गौरी ने एक मशहूर अंग्रेजी अखबार से अपने पत्रकारिता या यूं कहें कि लेखन की शुरुआत की। समाज की बुराइयों और सच्चाइयों को अपनी कलम से उकेरने वाली गौरी हत्या से पहले तक कन्नड़ भाषा की मशहूर पत्रिका ‘लंकेश पत्रिका’ की संपादक थीं। पत्रकारिता के क्षेत्र में गौरी की पहचान साहसी, बेबाक और एक तर्कशील पत्रकार के तौर पर बनी। अफसोस इस बात का है कि शायद गौरी की यही पहचान गौरी कि पत्रकारिता को ऐसा दुखद अंत की तरफ ले गई। सवाल ये है कि क्या युवा पत्रकार का दिल ऐसी घटनाओं से विचलित नहीं होता…? क्या उसके कलम की धार को ऐसी घटनाएं कुंद करने का काम नहीं करतीं…?

कलम से सामाजिक बुराइयों पर चोट और अपनी तार्किक एवं तथ्यात्मक आलोचनाएं एक ठेठ पत्रकार की पहचान होती है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि ना सिर्फ गौरी बल्कि कई पत्रकारों को अपनी इस पहचान की कीमत हत्यारों की गोली से चुकानी पड़ी है। मसलन -बलात्कारी गुरमीत राम रहीम के खिलाफ मुंह खोलने वाले (रामचंद्र छत्रपति), मध्य प्रदेश के चर्चित व्यापम घोटाले की तहे उघेड़ने वाले (कमलेश जैन),गैंगस्टर शहाबुद्दीन के काले कारनामे बेपर्दा करने वाले बिहार के निर्भिक पत्रकार (राजदेव रंजन)…। इन सभी के अलावा नरेंद्र दाभोलकर, गोविन्द पानसरे और एमएम कलबुर्गी जैसे नाम उन पत्रकारों की जमात में शामिल हैं, जिनका हश्र गौरी से जुदा नहीं है।
अपना मानना है कि हर पत्रकार के दिल में पत्रकारिता की एक आत्मा बसती है। यह अंतरात्मा उसे उसके पत्रकारिता पथ पर अपनी-अपनी राहें चुनने के लिए प्रेरित करती है।यकीनन आज उसकी यह अंतरात्मा स्तब्ध है और ऐसी परिस्थितियों में खुद को असहाय और असुरक्षित महसूस करते हुए ठिठक सी गई है। आजाद सोच किस बंधन में बंधा महसूस कर रहा है…? आखिर कौन इसे क़ैद करना चाहता है…? गौरी की मौत की ख़बर ने इस वक्त मेरी स्याही और आंखों में भारीपन ला दिया है इसलिए इन सवालों पर अब ज्यादा कुछ कह पाना शायद मुमकिन नहीं हो सकेगा…। पर याद रखेंगे कि गौरी कह कर गई है कि आजाद लेखन, आजाद सोच, और आजाद विचार ऐसी गोलियों की गुलाम कभी नहीं हो सकती।
गौरी लंकेश को सच्ची श्रद्धांजलि…

निशांत नंदन की कलम से…

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