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शिक्षक दिवस पर विशेष: गुरु रत्न धन पायो…

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शिक्षक दिवस

सत् – सत् नमन है उन गुरुओं को जिनके मार्गदर्शन ने हमे संसार को देखने का नजरिया दिया और लाखों-करोड़ों की इस भीड़ में खुद को पहचानने की अनमोल शिक्षा दी। यूं तो गुरु जी के अनंत उपकारों का वर्णन शब्दों का कोई भी भंडार पूरा नहीं कर सकता, लेकिन आज एक महान शख्सियत सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिन के इस खास मौके ने हमे दो पल जरुर दिये हैं कि हम अपने परम पूज्य गुरु जी के लिए अपने भावों को व्यक्त कर सकें।

गुरु मन कितना सुंदर है…

गुरु मन कितना हर्षित है…

गुरु मन कितना पुलकित है…

गुरु मन कितना स्नेहित है…

गुरु मन की यह वंदना अर्पित है उन सभी पूज्नीय गुरुओं को जो अब तक अपने ज्ञानरुपी असीम और सबसे बेशकिमती उपहार को अपने शिष्यों पर दिल खोल कर न्योछावर करते आए हैं। आज बात शिक्षक दिवस की हो रही है तो सारा ध्यान अपने गुरु के पास जा पहुंचा है, युवा मन खुद-ब-खुद बालमन में परिवर्तित हो गया है और नजरों के सामने साक्षात गुरु खड़े हैं, तो यकीनन आज बात होगी सिर्फ अपने प्रिय मास्टर साहब की। यूं तो बचपन से लेकर अब तक यह जिंदगी चंद मिनटों, कुछ घंटों और फिर बरसों में गुजरती ही चली आई है। भोर के उजाले के साथ कई विशेष स्मृतियां मानस पटल पर उगीं और फिर शाम होते-होते कही दूर गहराइयों में ढल गईं। लेकिन मालूम नहीं क्यों बचपन में गुरु की कही बातें और उनकी यादें अब भी उतनी ही तरोताजा हैं मानों अभी कल की ही बात हो। तीसरी कक्षा में बालमन को यह नहीं मालूम था कि आगे चलकर यह संसार मुझे किस रुप में स्वीकार करेगा।

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लेकिन इतना मालूम था कि एक गुरुजी ज्ञान का भंडार लेकर आए हैं और मैं इस संसार में सिर्फ ज्ञान हासिल करने के लिए ही आया हूं। यूं तो गुरु-चेले की कहानियां कभी खत्म नहीं होतीं, लेकिन कुछ दिलचस्प वाक्या हमेशा इन कहानियों में मौजूं रहते हैं। एक कड़क शिक्षक की पहचान रखने वाले मेरे गुरु जी की कई खासियतें थीं। (ध्यान दें..! गुरुजी के इन लक्ष्णों को मैं अब खासियत मानने लगा था वरना बालमन तो हमेशा ही गुरुजी की इन आदतों से नाराज़ ही रहता था)

बालमन को जितना  खेलना पसंद है उतना पसंद पढ़ना, तो ना कभी हुआ है और ना कभी होगा। लेकिन गुरुजी को इससे क्या…? बस सामने आते ही टास्क ( होम वर्क) पूरा हुआ की नहीं, कविता याद है कि नहीं, गणित के प्रश्न बने की नहीं और दिन भर तुम पढ़े की नहीं। गुरुजी के ऐसे सवाल अक्सरहा बालमन को इस शंका में डाल देते थे कि इन सवालों का सही जवाब दें या गलत, क्योंकि गुरुजी के गुस्से का शिकार तो दोनों ही सूरतों में होना तय था।

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बालमन की परेशानी सिर्फ इतनी ही नहीं थी, इत्तिफाक से मेरे गुरुजी का घर उनके चेले के घर के बिल्कुल ही पास था, तो जल्दी ही गुरुजी बचपन की सबसे प्यारी चीज (छुट्टियों) को लेकर भी बालमन के दुश्मन बन गए, और एक बात तो माननी ही पड़ेगी कि साल के दिन अगर 1000 होते तो मेरे गुरुजी हजारों दिन बिना किसी परेशानी के पढ़ाने जरुर आते। अब भी याद है मुझे, गुरुजी का गुस्से में मेरे बालों को खींचना, कानों को ऐंठने की हद से पार जाकर ऐंठना और सख्त हाथों को अचानक ही मेरे नरम गालों पर जोर से चिपका देना।

गुरुजी जी बड़े ही दबे पांव पढ़ाने आया करते थे मानों यह देखने आते थे कि हम उनके आने से पहले उनके खिलाफ कोई साजिश तो नहीं रच रहे, लेकिन गुरुजी कि इस आदत को मैंने भी जल्दी ही समझ लिया और फिर उनके आने से पहले किताबें बिछाकर कुछ इस तरह बैठ जाता मानो आज वो मेरी मेहनत देखकर मुझपर तरस खाएंगे। लेकिन अफसोस कि ऐसा होता नहीं था। गुरुजी का कड़क अंदाज और गरम मिजाज मेरी सारी मेहनत पर पानी फेर देता।

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खैर, वक्त का पहिया आगे बढ़ा और हम भी उम्र में थोड़े बड़े हो गए। लगा कि अब गुरुजी के हाथों से मेरे गालों और कानों की तकलीफ को थोड़ी राहत मिलेगी, लेकिन जल्द ही मालूम पड़ा कि गुरुजी भी अपने शिष्यों की एक उम्र के बाद हाथों से नहीं बल्कि डंडे से कूटाई किया करते हैं। तो इस उम्र में जैसे हीं गुरुजी ने एक दिन अपनी इस करिश्माई छड़ी का ज्ञान ( ध्यान दें! आप उसे ठुकाई करने वाला लठ भी कह सकते हैं) कराया मैं समझ गया कि ये गुरुजी का दिया हुआ सबसे परम ज्ञान है। एक सबसे दिलचस्प बात यह थी कि गुरुजी के पास रखी उस खास छड़ी पर उनके उन सभी प्यारे चेलों के नाम अंकित थें जिनको उन्होंने इस बेमिसाल छड़ी का दिव्य ज्ञान दिया था।

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बहरहाल आज ना तो मुझे गुरुजी के दबे पांव ट्यूशन के लिए घर आने का डर सताता है और ना ही उनकी छड़ी कि वो चोट हाथ मलने पर मजबूर करती है। गुजरते वक्त ने हमसे बचपन छीन लिया और गुरुजी को जुदा कर दिया। अब इसे गुरुजी की डांट कहें या फिर उनका डर आज जब कभी गुरु कि उस अनोखी छड़ी को याद करता हूं तो ऐसा लगता है कि उसी छड़ी के सहारे इस भीड़ में मैं अपने पैरों पर खड़ा हूं ।बचपन में गुरु से खाई डांट अब भी सिखाती है कि जिंदगी में गलतियां करने से पहले सोचो और गुरु की मार ये बताती है कि सही रास्ते कटीली राहों से ही गुजरते हैं।

हे गुरु तुम्हें नमन है…

 

निशांत नंदन की कलम से…

 

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