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नायक का रोल छोड़ खलनायक बने जिन्ना को महिमामंडित न करें

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मोहम्मद अली जिन्ना
साभार-फेसबुक

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र संघ के दफ्तर मे मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर को लेकर खड़ा हुआ विवाद वैसे तो शुद्ध सियासी विवाद है। बावजूद इसके इस विवाद की आड़ में जिन्ना को महिमामंडित करना उचित नहीं होगा। इस बात में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि मोहम्मद अली जिन्ना ने भारत की आज़ादी की लड़ाई लड़ी लेकिन, इस बात में भी किसी को संदेह नहीं होना चाहिए कि थोड़े ही दिनों बाद जिन्ना अंग्रेजों का पिट्ठू बन गया और आजादी की लड़ाई को बेहद कमजोर कर गया। जिन्ना ने भारत और पाकिस्तान को कभी खत्म नहीं होने वाले ऐसे झगड़े दिए जिसका खामियाजा आज तक दोनों देश भुगत रहे हैं।

जिस अलीगढ़ मुस्लिम यूनवर्सिटी में जिन्ना की तस्वीर लगी है उसी यूनिवर्सिटी के संस्थापक ने पहली बार देश को टुकड़े करने का नीच विचार पेश किया था। 1867 में ही सर सैयद अहमद खान ने मुसलमानों के लिए अलग देश की मांग उठा दी थी। हालांकि तब अंग्रेजों ने उनकी बात को कई तवज्जो नहीं दी और बात आई-गई होती रही। लेकिन, 1920 में एक बड़ी घटना हो गई। इसी साल मोहम्मद अली जिन्ना ने महात्मा गांधी को हिंदुवादी नेता करार देते हुए मुसलमानों को महात्मा गांधी से सतर्क रहने की सलाह दे दी। जिन्ना की इस अपील से आजादी की लड़ाई में बड़ी गफलत पैदा हो गई। जिन्ना की इस अपील के पीछे फिरंगी लार्ड रीडिग का दिमाग काम रहा था। लार्ड रीडिग ने ही आजादी की लड़ाई को कमजोर करने के मकसद से जिन्ना को इस योजना पर काम करने के लिए तैयार किया था। ये वही लार्ड रीडिग था जिसके हाथों 1925 में जिन्ना ने नाइटहुड की उपाधि ली थी। और आजादी का नायक जिन्ना अब पूरी तरह से देश और इंसानियत के लिए खलनायक बन चुका था।

रीडिग से उपाधि पाने के बाद जिन्ना खुलकर अंग्रेजों के लिए काम करने लगा था। 1930 में जिन्ना के सहयोगी मोहम्मद इकबाल ने इलाहाबाद में मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र की मांग के समर्थन में जलसा किया। 1933 में जिन्ना के मित्र रहमत अली ने अलग देश की मांग के साथ अलग देश का नाम भी सुझाया। इसी साल रहमत अली ने पाकिस्तान नाम के देश के मिर्माण के लिए पर्चे बंटवाए। देश में तनाव बढ़ता जा रहा था। भारतीय समाज आपस में लड़ कर कमजोर होने लगा था।

इसी बीच 1934 में जिन्ना ने मुस्लिम लीग का पुनर्गठन किया और पुनर्गठन के मौके पर महात्मा गांधी, कांग्रेस, अब्बुल कलाम आज़ाद और जमात-ए-इस्लामी को मुसलमानों का दुश्मन कह कर संबोधित किया।

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जिन्ना ने समाज और इंसानियत के खिलाफ सबसे घटिया कदम 1937 में उठाया। 1937 में जब कांग्रेस ने जिन्ना के पाकिस्तान विचार को खारिज कर दिया तब जिन्ना आपा खो बैठा और अंग्रेजों के इशारे पर उसने मुसलमानों से गृहयुद्ध की अपील कर दी। जिन्ना की इस घटिया चाल से देश भर में दंगे भड़क गए। जैसे-तैसे दंगों पर काबू पाया ही गया कि फिर 1940 के लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने प्रस्ताव पारित कर कहा कि लीग का मुख्य उद्देश्य पाकिस्तान का निर्माण है और इसके लिए मुसलमानों को आखिरी लड़ाई लड़नी होगी।

1940 के इस लाहौर अधिवेशन का सबसे अधिक फायदा अंग्रेजों को हुआ। अंग्रेजों ने बड़ी आसानी से देश भर में हिंदु-मुस्लिम दंगों की आग लगा दी। लेकिन इसके ठीक बाद 1942 में आजादी के दीवानों ने ऐसी आग लगाई जिसमें जिन्ना और अंग्रेजों की लगाई आग खुद जल कर राख हो गई। 1942 के राष्ट्रीय आंदोलन से जिन्ना और अंग्रेज, दोनों बौखला गए। देश को फिर सांप्रदायिक दंगों की आग में झोंक दिया गया। 1946 में प्रतिनिधि सभा के चुनाव में मुसलमान बहुल इलाकों में मुस्लिम लीग ने बड़ी सफलता हासिल की। चुनाव के नतीजों से कांग्रेस कमजोर पड़ गई और मुस्लिम लीग प्रतिनिधियों ने देश के बंटवारे का प्रस्ताव पारित कर अंग्रेजों की झोली में डाल दिया।

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ऐसे जिन्ना को भारत में आजादी की लड़ाई का नायक नहीं माना जाना चाहिए। ऐसे जिन्ना को तो पाकिस्तान में भी आजादी की लड़ाई का नायक नहीं माना चाहिए। तो फिर जिन्ना की तस्वीर को किसी यूनिवर्सिटी में सजाने का मतलब ही क्या है ? उस तस्वीर के समर्थन में उतरने का मतलब क्या है ?

 

वरिष्ठ पत्रकार असित नाथ तिवारी के ब्लॉग से…

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