बिहार के ‘नायक’ जिनपर दुनिया को है गर्व…..

  • December 22, 2017
Share:

यकीनन बरसों से ही बिहार की धरती ऐसे ही महान शख्यिसतों की कर्मभूमि रही है जिन्होंने अपनी साहस, लगन और सफलता के दम पर ना सिर्फ प्रसिद्धी हासिल की है बल्कि दुनिया को सौहार्द और प्रेम का अनमोल पाठ भी पढ़ाया। biharmedia.com बिहार के ऐसे ‘नायकों’ को नमन् करता है।  अपनी इस कड़ी में  हमारा प्रयास है कि हम आपको यहां की मिट्टी में पैदा हुए कुछ ऐसे नायकों से रुबरु कराएं जिनकी वीरगाथाएं और जिनका योगदान कई पीढ़ियों के लिए एक बहुमूल्य वरदान है। बिहार के ‘नायक’ की पहली किस्त समर्पित है उन महान व्यक्तित्वों को जिनपर ना सिर्फ हम बिहारियों को बल्कि पूरी दुनिया को नाज है।

बाबू वीर कुंवर सिंह –

बिहार के ‘नायक’ की इस पहली कड़ी में सबसे पहले बाबू वीर कुंवर सिंह का नाम इसलिए भी लेना जरुरी है क्योंकि उनके शौर्य, और अदम्य साहस की गाथाएं सदियों से हमारे दिलों में बसी हैं और ये उनकी जीवनी अरसे तक आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत रहेंगी। भोजपुर जिले के जगदीशपुर के बाबू कुंवर सिंह के नाम में ‘वीर’ शब्द का जुड़ा होना ही उनके ‘नायक’ होने का पहला परिचय है। वर्ष 1857 की लड़ाई में इस नायक ने अंग्रेजों को नाकों चने चबाने पर मजबूर कर दिया था। कहा जाता है कि जब कभी युद्ध के मैदान में घोड़े पर बैठे बाबू वीर कुंवर सिंह की तलवार गरजती थी तो दुश्मन दुम दबाकर भाग खड़े होते थे। जब फिरंगियों ने बाबू वीर कुंवर सिंह को सब तरफ से घेर लिया तो उन्होंने अंग्रेजों के सामने घुटने टेकने के बजाए अपनी तलवार से उनका सामना एक योद्धा की तरह किया। वीर कुंवर सिंह को अंग्रेज पकड़ नहीं पाए। अस्सी साल के इस पराक्रमी वीर ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिये। इनकी याद में सरकार ने आरा में वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय की स्थापना भी करवाई।

यह भी पढ़ें-ये हैं वो ‘बिहारी व्यंजन’ जिसकी दुनिया है दिवानी…

डॉ. राजेंद्र प्रसाद-

भारत देश का पहला राष्ट्रपति बनने का गौरव बिहार के ही डॉ. राजेंद्र प्रसाद को प्राप्त हुआ था। सन् 1934 के बॉम्बे सेशन के दौरान वे देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे। सन् 1930 के नमक सत्याग्रह और सन् 1942 के भारत छोड़ो आन्दोलन में वे राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के निकट सहयोगी रहे हैं। बचपन से ही पढ़ाई-लिखाई में प्रतिभावान राजेंद्र प्रसाद की पूरी जिंदगी प्रेरणाओं और आदर्शों से भरी हुई है। देशभर में अत्यन्त लोकप्रिय होने के कारण उन्हें ‘राजेन्द्र बाबू’ या ‘देशरत्न’ कहकर पुकारा जाता है। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद एक ऐसा नाम है जिसपर आज हर बिहारी गर्व करता है।

यह भी पढ़ें-बिहार का तिलकुट नहीं खाया तो कुछ नहीं खाया…

जय प्रकाश नारायण-
लोक नायक जय प्रकाश नारायण को 1970 में इंदिरा गांधी के विरुद्ध विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए जाना जाता है। इन्दिरा गांधी को पद से हटाने के लिये उन्होंने ‘सम्पूर्ण क्रांति’ आन्दोलन चलाया। जन नायक जय प्रकाश नारायण के बारे में यह कहानी प्रचलित है कि जब आपातकाल के वक्त कुछ छात्रों ने उनसे आंदोलन का नेतृत्व करने की अपील की तो वो उस समय बीमार चल रहे थे, लेकिन छात्रों की अपील पर जयनायक ने उन्हें निराश नहीं किया। बीमार होेने के बावजूद पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में जब जय प्रकाश नारायण ने तत्कालीन केंद्र की इंदिरा सरकार के खिलाफ हुंकार भरी तो दिल्ली की गद्दी डोल उठी। सन् 1999 में जयप्रकाश नारायण को मरणोपरान्त भारत रत्न से सम्मनित किया गया। पटना हवाई अड्डे का नाम उन्हीं के नाम पर रखा गया है।

यह भी पढ़ें-शिक्षक दिवस पर विशेष: गुरु रत्न धन पायो…

श्रीकृष्ण सिंह-

‘बिहार केशरी’ के नाम से विख्यात श्रीकृष्ण सिंह राज्य के पहले मुख्यमंत्री थे। आधुनिक बिहार के निर्माता के तौर पर भी इन्हें जाना जाता है। बिहार, भारत का पहला राज्य था, जहाँ सबसे पहले उनके नेतृत्व में ज़मींदारी प्रथा का उन्मूलन उनके शासनकाल में हुआ था। उनका जन्म मुंगेर जिला में हुआ था।

यह भी पढ़ें-जानिए पटना पुस्तक मेले का इतिहास और इस बार का ‘पिंक’ कनेक्शन…

जगजीवन राम-

भोजपुर जिले के चंदवा में जन्मे बाबू जगजीवन राम अपने समय के सबसे बड़े दलित नेता थे। प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु की सरकार में वे सबसे कम उम्र के कैबिनेट मंत्री थे। 1971 के भारत-पाक युद्ध के समय वे देश के रक्षा मंत्री थे। संसदीय लोकतंत्र के विकास में उनका अमूल्य योगदान रहा है।

डॉ अनुग्रह नारायण सिंह-
‘बिहार विभूति’ के नाम से विख्यात अनुग्रह नारायण सिंह राज्य के पहले उपमुख्यमंत्री थे। वे महात्मा गाँधी तथा राजेंद्र बाबू के निकट सहयोगी थे। बिहार के प्रशासनिक ढांचा को तैयार करने का श्रेय अनुग्रह बाबू को ही जाता है।

 

Tags


Comments

Leave A comment