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खेल मदारी का

रामपुर में हाट के दिन बाजार से सटे खाली मैदान में भारी भीड़ एक गोलाकार क्षेत्र के बाहर लगी है।बीच के गोलाकार क्षेत्र में एक आदमी खालिस कुर्ते-पाजामे और बंडी में बीच में खड़ा है, जिसके हाथ मे छोटा डमरू है।पास में मैले-कुचैले कपड़ों में एक व्यक्ति बांस की ढक्कन लगी गोल टोकरी लिए बैठा है। डुगडुगी के शोर के बीच ऊंची आवाज में यह सुनाई देता है-मेहरबानों, कद्रदानों आपको खेल दिखता हूँ।सबसे पहले पुराना खेल!वह बैठे आदमी की ओर इशारा करता है।बैठा आदमी टोकरी से साँप निकालकर पाँच मिनट तक खेल दिखता है।खेल खत्म होते ही खूब तालियाँ बजती हैं।भीड़ और बढ़ जाती है।फिर डुगडुगी बजती है।वही आवाज गूँजती है-मेहरबानों, कद्रदानों-अब दूसरा खेल!भीड़ को चीरते हुए मदारी बन्दर लेकर आता है और बन्दर का खेल दिखाता है।बहुत तालियाँ बजती हैं।भीड़ और बढ़ जाती है।दस मिनटों में खेल खत्म होते ही फिर डुगडुगी बजती है।आवाज आती है-मेहरबानों, कद्रदानों!अब तीसरा खेल।तीसरा खेल सबसे ज्यादा मजेदार है।आपलोग अपनी श्रद्धा से कलाकारों का मनोबल बढ़ाएं।भीड़ को चीरकर आधुनिक वस्त्र और साजसज्जा से आच्छादित  दस युवा गोलाकार खाली क्षेत्र में डब्बा लिए आते हैं।वे घूम-घूम कर लोगों को उकसाकर पैसे बटोर रहे हैं।सब के डब्बे नोटों और सिक्कों से भर गए।वे करीब आधे घण्टे तक वसूली कर चले जाते हैं।फिर डुगडुगी बजती है और आवाज आती है-मेहरबानों, कद्रदानों!इस आवाज पर भीड़ को चीरते हुए कुछ लोग छोटा जनरेटर सेट,स्क्रीन  लेकर आते हैं।जनरेटर चलाकर स्क्रीन के साथ लगा लैप्टोप चलाते हैं।फिर फोन की मदद से इंटरनेट लगाया और चलाया जाता है।अब स्क्रीन पर कवि छन्देश मुक्त की कविताएं दिखाई पड़ती हैं।डुगडुगी बजाकर बताया जाता है कि देखो!इस जादू से कवि की वर्षों पूर्व की कविता पढ़ सकते हैं।डुगडुगी बजाने वाला ऊंचे स्वर में पढ़ता जाता है।भीड़ से तालीयाँ भी बजवा लेता है।फिर बताता है कि कविवर छेन्देश मुक्त जी स्वयं प्रगट होंगे।थोड़ी देर में कविवर स्क्रीन पर प्रगट होते हैं।वे बताते हैं कि देश,विदेश के छप्पन स्थानों में एकसाथ सब यह कार्यक्रम इंटरनेट के माध्यम से देख रहे हैं।वे साहित्य के प्रचार में लगे हैं।फिर वे अपनी कविता सुनाते हैं-

इंटरनेट के युग में

काम बड़ा आसान।

इसके बारे में सुनें

धैर्यपूर्वक श्रीमान।

यूट्यूब,ट्विटर,नेट पर

साहित्यकार की होती पहचान।

कवि छन्देश मुक्त हैं

मुक्त कविता की खान।

करता हूँ साहित्य की सेवा

मेरी रचनाएँ महान।

मैं स्वयं ही पधार गया

धन्य हुआ शहर श्रीमान।

 

डुगडुगी बजाने वाले और उनके चेलों के माध्यम से खूब तालीयाँ बजवाई जाती हैं।देखा-देखी लोग तालियों में अपना योगदान कर देते हैं।

मुक्त जी अपनी दूसरी रचना पढ़ते हैं-

 

कम्प्यूटर,माउस,नेट की खोज ने

मिटा दिए सब भ्रांति।

पूरी दुनिया कनेक्ट हुई

आ गयी ऐसी क्रांति।

 

खूब तालियाँ बजती और बजवाई जाती हैं।

अब मुक्त जी की अंतिम रचना सुनाई जा रही है-

डॉगी ने बूल से कहा

यू आर निपट गंवार।

तभी कैट जम्प कर बोली

आई एम स्टिल होशियार।

अब स्क्रीन ऑफ़ हो जाता है।डब्बे लेकर वसूली का कार्यक्रम चल पड़ता है।तभी एक पत्रकार डुगडुगी वाले से पूछता है-आपलोग कविताएं कैसे लिखते हैं?वह भीड़ से निकलकर अकेले में उसे समझाता है-देखो मैं तुमको भी कवि बना दूँगा।अगले कार्यक्रम में तुम्हारी कविताएं सुनवा दूँगा।कट पेस्ट जानते हो?इधर का माल उधर।खालिस हिंदी में सुनो-कहीं का ईंट,कहीं का रोड़ा भानुमति ने कुँनवा जोड़ा।

हम जोड़ ,तोड़,मरोड़कर आज के युवाओं की भाषा मे इस तरह इंटरनेट की मदद से कविता बनाते हैं।जिसे चाहते हैं उसे बड़ा कवि घोषित करवा देते हैं।अपने को साहित्य से क्या मतलब।वह फुसलाकर पत्रकार महोदय से पांच हज़ार ले कर अपना कार्ड देता है।फिर समान बांधकर बस से लौट जाता है।

रामेसर रामपुर वालों को इंटरनेट से साहित्य के लाभ के बारे में चौपाल में अब भाषण नहीं देता।इस घटना के बाद से रामेसर रामपुर में दिखाई नहीं देता।मालूम हुआ कि वह बड़ा साहित्यकार हो चुका है और उसे बहुत से पुरस्कार भी मिले हैं।

जैसे उनके दिन फिरे, सबके फिरें।

अस्तु।

प्रशान्त करण

@सर्वाधिकार सुरक्षित

 विशेष अनुमति से प्रकाशित

लेखक श्री प्रशांत करण (सेवानिवृत्त)वरिष्ठ IPS अधिकारी हैं एवं लेखन कला में विशेष रूचि रखते हैं।

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